{"product_id":"swasthya-aur-samaj-ek-bhinn-swar","title":"Swasthya Aur Samaj- Ek Bhinn Swar","description":"\u003cp\u003eसम्पूर्ण इतिहास में सभी सभ्यताएं बीमारी और रुग्णता के खतरों के साथ पली हैं। हालांकि हर सभ्यता ने इस  हकीकत से निपटने के अपने तरीके ईजाद किए, मगर रोगमुक्त जीवन का ख्वाब तो पिछली दो सदियों में ही देखा जाने लगां है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विकास से हमें बीमारी की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप के औजार मिले। किन्तु, आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के इस शुरूआती पुलाय के बाद चिन्ताएं पैदा हुई हैं। पिछले सालों में भारत की स्वास्थ्य सम्बन्धी स्थिति में कई अहम बदलाव आये हैं। पिछले दशक में दवाइयों और कीटनाशकों के विरुद्ध प्रतिरोध की समस्या उभरी है और संक्रामक व परजीवी जनित बीमारियों ने फिर से सिर उठाया है। एड्स का नया खतरा तो मुहं बाए खड़ा ही है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eदरकार तो समाज के ढांचे में बदलाव की थी मगर जो मिला वह है ढांचा समायोजन। भारत ने सन् 1991 में ढांचा समायोजन कार्यक्रम को अपनाया। कहा गया कि यह हमारी 'कमजोर' अर्थव्यवस्था में जान फूंकने का एक प्रयास है। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष द्वारा थोपी गयी शर्तों के अधीन देश की आर्थिक नीति में व्यापक परिवर्तन किये जा रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में, जरूरी दवाइयों सम्वन्धी नियंत्रण खत्म किये जा रहे हैं, सरकारी अस्पतालों में सेवा शुल्क वसूली लागू की जा रही है, स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च में कटोती की जा रही है. जनसंख्या नियंत्रण का दबाव बढ़ रहा है और निजीकरण को महत्त्व दिया जा रहा है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\"सन् 2000 तक सबके लिये स्वास्थ्य\" का नारा जिस जोशो-खरोश से उछाला गया था आज लगता है कि उसे फुसफुसाने में भी शर्मिन्दगी महसूस होने लगी है। इसके एवज में अच 'चुनिंदा' प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को ही एकमात्र विकल्प बताकर पेश किया जा रहा है। ऐसी हालत में यह और भी जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्य सम्बन्धी बहस को एक बार फिर नये सिरे से छेड़ा जाये। अन्यायपूर्ण नीतियों को रोकना और संसाधनों व सत्ता के असमान वितरण के प्रयासों का विरोध लोगों की संगठित ताकत से ही संभव है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eस्वास्थ्य सुविधाएं मध्यम दर्जे के कार्यकर्ताओं पर टिकी हैं-नर्स, ए. एन. एम. (दाइयां) और मैरामिडिकल कर्मचारी (अर्द्ध-चिकित्साकर्मी)। ये कार्यकर्ता ही लोगों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के संपर्क में आते हैं। परन्तु खुद के काम के विश्लेषण में इनकी भागीदारी नहीं होती। पहली बात तो यह है कि निचले दर्जे में होने के कारण इनसे सिर्फ आदेशों के पालन करने की अपेक्षा जाती है, निर्णयों में इनकी कोई भागीदारी नहीं होती है। दूसरी बात, यह है कि इन्हें यदि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया जाए इनकी ट्रेनिंग इस तरह नहीं हुई है कि ये अपने व्यावहारिक अनुभवों से अवधारणा या विचार विकसित कर सकें या अवधारणाओं व्यवहार में बदल सकें।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eजानकारी अपने आप बदलाव नहीं लाती। परन्तु जानकारी बदलाव की एक पूर्व शर्त जरूर है। समाज और स्वास्थ्य' में हमने को की है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहे विकास के ताजा घटनाक्रम को शामिल करें ताकि वर्तमान की झलक मिल सके। नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों को शामिल कर लिया गया है। वैसे तो यह पुस्तक हर स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के उपयोग हेतु लिखी गयी विशेषकर उन सभी के लिये जो स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों को समझना चाहते हैं और 'गरीबों के स्वास्थ्य' के लिये काम करना चाल हैं। हमें अपने पाठकों की प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा।\u003c\/p\u003e","brand":"Women Writers Workshop","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48059558265089,"sku":null,"price":100.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0663\/4589\/4145\/files\/Untitled_design_22_281d7e74-4787-4a60-84b1-5101ee96e076.png?v=1771226765","url":"https:\/\/eklavyapitara.in\/products\/swasthya-aur-samaj-ek-bhinn-swar","provider":"Eklavya Pitara","version":"1.0","type":"link"}