Futt-Baal
Futt-Baal
Publisher: Eklavya
Author: Varun Grover
Illustrator: Rajeev Eipe
ISBN: 978-81-19771-36-3
Binding: Paperback
Language: Hindi
Pages: 20
Published: Nov-2025
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फुट्ट-बाल - बाल एक ऐसे बच्चे की कहानी है जिसके लिए हरेक शब्द को बोलना जैसे किसी इम्तिहान से गुज़रना हो। मज़ाक, झेंप और डर के बीच अपनी पहचान को खोजने, अपनेपन को पाने की इस यात्रा में शायद आपको अपना कुछ हिस्सा मिल जाए।

लेखक ने बहुत ही आसान शब्दों में एक गहरी बात कह दी है। यह कहानी स्कूल के उन दिनों की याद दिलाती है जहाँ हम अपनी भाषा और बोलने के तरीके के कारण कभी-कभी अकेले पड़ जाते हैं साथ ही,यह कहानी हर उस व्यक्ति को अपनी लगेगी जिसने कभी किसी नई जगह पर खुद को अजनबी महसूस किया हो।
राजीव आइप के चित्र हैं। इन चित्रों ने कहानी को और भी मज़ेदार बना दिया है।
न सिर्फ भाषाओं के उच्चारण पर, वरन उनके व्याकरण पर भी हमारी बोली और भाषा का असर रहता है - वरना कोई धोती को 'ढोटी' नहीं कहता, न पेट्रोलियम को 'पेत्रोलियम', न कागज़ का बहुवचन 'कागज़ात' करता .. ऐसी चीजें भाषा को समृद्ध, सहज और प्रवाहमयी बनाती हैं. भाषा का मानकीकरण तो ठीक है, किंतु लता को 'लोता' बोलने से भाषा में विविधता, खूबसूरती और स्थानीयता आती है जो हमें आह्लादित करती है, और भाषा को आगे ले जाती है ..
भोजपुरी भाषी अक्सर हाथ को 'हाँथ' और हाथी को 'हाँथी' बोलते हैं जिन्हें अच्छा नहीं कहा जा सकता, किंतु दरिद्र को 'दलिद्दर' कहने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए. यह भोजपुरी की अपनी रवानी के अंतर्गत है, जैसे फुटबॉल को 'फुट्ट-बाल' कहना .. इस पर हंसा नहीं जा सकता (हालांकि बच्चे तो हंस ही सकते हैं).